|| किसलय ||
हाय रे लोकतंत्र..! झारखंड विधानसभा चुनाव के पहले चरण में मतदान प्रतिशत के आंकडे देखने के बाद तो बस यही आह निकलती है। खासकर, राज्य की राजधानी में आंकडो की इस दुर्दशा पर और क्या कहा जाए ! चुनाव आयोग द्वारा जारी इस फाइनल आंकडे पर अखबार भी मानते हैं कि झारखंड में मतदान के प्रति ऐसी बेरूखी पहले कभी नहीं देखी गयी। जाहिरन, कई सवाल एक साथ उभरते हैं- क्या लोक के लिये लोकतंत्र का मायने अब खत्म हो रहा है? फिर, क्या अस्त्वि है सरकार-प्रशासन, चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं का? समाज का बहुसंख्यक हिस्सा क्या इतना स्वावलंबी हो गया कि उसे वर्तमान शासन से न कोई गिला बचा, न कोई ख्वाहिश ही? राजनीतिक दलों की छवि पर क्या टिप्पणी की जाए, उनके हिस्से के शब्द तो कब के शेष हो गए। लेकिन, ये प्रेस-मीडिया...!..
हुंह.. कितनी बडी-बडी बातें सुन रखी थीं: चौथा स्तंभ.. ओपिनियन बिल्डर.. क्या हुआ उन सब का?.. कम से कम, इस चुनाव में तो महीनों से अखबार रंगे जा रहे थे, टीवी पर ताबडतोड बहस-मुबाहसा चल रहा था। कोडा, भ्रष्टाचार, कुशासन पर भारी-भरकम फॉन्ट साइज वाली सुर्खियां..! सब के सब दम तोड गयीं?
झारखंड विधानसभा के लिये पहले चरण्ा में
26 सीटों पर
संपन्न मतदान के आंकडे
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विधानसभा क्षेत्र
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वोट प्रतिशत
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| रांची |
32.91 |
| हटिया |
39.45 |
| कांके |
43.57 |
| पाकुड |
72.34 |
| राजमहल |
58.34 |
| बोरियो |
56.09 |
| बरहेट |
60.57 |
| लिट्टीपाडा |
60.00 |
| महेशपुर |
64.97 |
| नाला |
66.42 |
| जामताडा |
62.00 |
| मधुपुर |
61.00 |
| सारठ |
64.00 |
| देवघर |
47.00 |
| पोडैयाहाट |
63.38 |
| गोड्डा |
57.49 |
| महगामा |
57.31 |
| सिंदरी |
54.73 |
| निरसा |
57.64 |
| धनबाद |
42.07 |
| झरिया |
44.29 |
| टुंडी |
57.86 |
| बाघमारा |
65.34 |
| जुगसलाई |
60.00 |
| जमशेदपुर पूर्वी |
45.19 |
| जमशेदपुर पश्चिम |
42.17 |
कुल
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53.10
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और तो और, संयोग देखिये, 25 नवंबर को होनेवाले झारखंड विधानसभा के लिये पहले चरण के मतदान से ठीक एक दिन पहले आइआरएस (इंडियन रीडरशिप सर्वे) का नतीजा आता है। राज्य के हर बडे अखबारों ने शब्दों की बाजीगरी के साथ नंबर वन का अपना-अपना दावा ठोंक दिया। किसी ने स्टेट का लीडर बताया तो किसी ने लाखों नये पाठक जुडने का डंका बजाया। एक न्यूज चैनल नंबर-1 का एनिमेशन चलाये ही जा रहा है..! लेकिन भैय्ये, बात कुछ पल्ले पडी नहीं। सब कहते हो नंबर वन। आखिर किस विधा, किस दिशा में नंबर वन? लाखों पाठक जोडे.. कहां, किस जहां में? आखिर क्या कुछ छाप कर जोडा उन्हें, कुछ तो असर दिखता..?! अब कह रहे हैं- लोग आत्मकेंद्रीत हो गये हैं। बाजारवाद-उपभोक्तावाद ने जकड लिया है।.. लेकिन ग्लैमरस ब्रान्ड और कलरफूल ऐड के जरिए कौन उकसाता रहा इन सबके लिये। चलिये छोडिये इन बातों को। हां, अबकी आपने की है बात पते की। देर-सबेर मर्ज तो समझ गये। अब तक, आप केवल कोडा की कमाई के आंकडे छापते रहे। कभी जानने की कोशिश की कि यह बहुसंख्यक मिडिल क्लास उन आंकडों को कैसे एनालाइज करता है? - '..चार हजार करोड छोडो, मेरे पास चार करोड आ जाएं तो मैं अपनी मुन्नी के लिये भी एक और गाडी ले दूं। सबको छुट्टियों में स्वीटजरलैन्ड घुमा लाऊं.. मैं तो सीधा लोनावाला में फ्लैट ले लूं। ...और मेरा वह नौलखा हार नहीं भूलना !'
..तो बडे भैय्या यह है अपना मिडिल क्लास। इसे वाकई चिंता है तो केवल पुराने दुपहिये को हटा, नई कार खरीदने की। लोन से ही क्यों नहीं। और बाद में पूछिये तो पता चलेगा कार दो महीने में एक बार उतरी सडक पर। लेकिन लोन की किस्तें तो हर माह चुकानी है। इधर, पडोसी के नये फ्लैट के गृहप्रवेश की खबर ने तो बेचैनी और भी बढा दी है। अब, ऐसे में आपकी वे सूर्खियां ! अधमुंदी आंखें लिये कश्मकश में बीती आधी रात बाद आयी नींद उन्हें रंगीन कोडा-लोक के सपने ही तो दिखाती हैं। सच पूछिये तो यह मिडिल क्लास आज बिल्कुल भटक चुका है। उसके लिये 'मूल्यों' का मतलब है बाजार-मॉल के शो केस से ललचाते लकदक लिबास अथवा विलासी उपकरणों से लटकते प्राइस टैग। रात के वे सपने उनमें इतने गहरे समाये होते हैं कि वे आइना झांकना तक भूल जाते हैं। काश, उन पारदर्शी शोकेश की एक दीवार पर आदमकद आइना भी लगाने का चलन होता !
लेकिन नहीं, आइना दिखाने की जिम्मेवारी तो आपकी थी !.. अब भी वख्त है। आत्मतुष्टि वाली 'तख्तापलट पत्रकारिता' से ज्यादा जरूरी है भटके जनगण को वास्तविकता के धरातल पर लौटाना। इन्हें आइना दिखाना होगा, इतिहास का आइना। गौरवशाली, सुसंस्कृत, विवेकवान जीवनशैली वाले इतिहास का। जहां 'इंसानी जरूरतों' की स्थापित परिभाषा थी। बस एकबार यह मिडिल क्लास 'मूल्यों' और प्राइस टैग में अंतर स्पष्ट कर ले, फिर क्या मजाल.. कोडा-विनोद-संजय इतने कद्दावर हो जायें ! एक तो उन्हें ऊगने की जमीन ही न मिले,.. घास-फूस की तरह ऊगे भी तो रौंद दिये जाएंगे।