यूं तो मीडिया और अखबारों की भूमिका और चरित्र अब खुल रहा है। लेकिन वरिष्ठ भाजपा नेता लालजी टंडन जैसे लोग देश के नंबर 1 अखबार पर सीधी ऊंगली उठायें तो बहुत कुछ कहने की जरूरत नहीं। हालांकि, सिक्के का दूसरा पहलू भी है। नेताओं में कितने बचे हैं हैं जिनकी कथनी पर जनता आंख मूंदकर भरोसा करे। बहरहाल, कुल मिला कर देखें तो यह घटनाएं हमारे समाज की बदरूपता को ही इंगित कर रहे हैं। लेकिन, क्या हम आइना देखना छोड दें? नहीं ना ! तो सुनिये यूपी के वरिष्ठ भाजपाई टंडन जी प्रसिद्ध पत्रकार राम बहादुर राय के संपादकत्व में प्रकाशित हो रहे 'प्रथम प्रवक्ता' पत्रिका को दिये अपने साक्षात्कार में क्या कुछ कहा एक राष्ट्रीय अखबार के बारे में:
'मैं जब उत्तर प्रदेश में मंत्री था तब कानपुर में स्वर्गीय नरेंद्र मोहन के नाम पर पुल का नामकरण कराया। जागरण वालों के मल्टीप्लेक्स को जमीन हमारे समय में दी गई। जागरण का जो स्कूल चलता है, उसका दफ्तर जहां चल रहा है वे जमीनें हमारे समय में मिलीं। लेकिन यह सब मैंने किसी अपेक्षा में नहीं बल्कि अपना मित्र धर्म निभाने के लिए किया था। फिर भी दैनिक जागरण ने मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया। मैं जब इस लोकसभा चुनाव में लखनऊ से प्रत्याशी था तो जागरण के कुछ लोग मुझसे मिलने आए। उन लोगों ने मुझसे चुनाव कवरेज के लिए खुलकर पैसे मांगे।
जागरण के लोगों ने साफ तौर पर मुझसे कहा कि आप भी कुछ कर दें तो आपकी भी खूब खबरें छपेंगी। लेकिन मैं इस भ्रष्टाचार में शामिल नहीं हुआ। उल्टे मैंने इसे मुद्दा बना दिया। जागरण के अलावा मुझसे किसी ने पैसा नहीं मांगा। मैंने इस पूरे मामले की शिकायत सीधे जनता की अदालत में की। इसका असर यह हुआ कि लखनऊ में न केवल दैनिक जागरण की विश्वसनीयता घटी है बल्कि बहुत सारे लोगों ने दैनिक जागरण पढ़ना बंद कर दिया है। दैनिक जागरण ने सिर्फ मेरे साथ ही ऐसा नहीं किया बल्कि चुनाव के समय पूरे प्रदेश में उसने उन्हीं लोगों की खबरें प्रकाशित की जिसने उनको पैसा दिया। इस आम चुनाव में दैनिक जागरण जैसे मीडिया हाउस ने जैसा व्यवहार किया, उससे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ होने की सारी मर्यादाएं टूट गईं।'